पटना, 1 सितंबर 2025।
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची (Special Intensive Revision — SIR) प्रक्रिया पर मचा बवाल अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच गया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि समय सीमा आगे नहीं बढ़ाई जाएगी, लेकिन 1 सितंबर के बाद भी दाखिल होने वाले दावे और आपत्तियों को अंतिम सूची में शामिल किया जाएगा। इस बीच चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा है कि वे केवल आरोप लगा रहे हैं, लेकिन विधिवत प्रक्रिया में शामिल नहीं हो रहे।
जाती – जाती करके नेता त उजिया गेलन, जनता मुंहतक़वा
अदालत का रुख
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि 1 सितंबर की डेडलाइन नहीं बढ़ाई जाएगी, ताकि चुनावी कार्यक्रम प्रभावित न हो।
हालांकि, मतदाता नए नाम जोड़ने (Form-6) या नाम हटाने की आपत्ति (Form-7) नामांकन की अंतिम तिथि तक जमा कर सकते हैं।
अदालत ने इसे “विश्वास की कमी” का मामला बताया और राजनीतिक दलों को सक्रिय भूमिका निभाने की सलाह दी।
साथ ही, बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिए गए हैं कि पैरा-लीगल वॉलंटियर्स जिला स्तर पर मतदाताओं और दलों की मदद करें।
चुनाव आयोग की सफाई
चुनाव आयोग (ECI) ने कहा कि अब तक 98.2% मतदाताओं के दस्तावेज सत्यापित हो चुके हैं।
पहले चरण में 1.2 लाख से अधिक दावे/आपत्तियाँ दर्ज हुईं, जबकि अब तक 2 लाख से ज्यादा आपत्तियाँ दाखिल की गई हैं।
ECI का कहना है कि विपक्ष की तरफ से बार-बार लाखों नाम हटाए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं, लेकिन सही फॉर्म (Form-6/7) में आवेदन नहीं किया जा रहा।
आयोग ने कहा कि सामूहिक शिकायतें मान्य नहीं हैं; हर केस को विधिवत प्रक्रिया से ही देखा जाएगा।
बिहार में 40% महिलाओं पर घरेलू हिंसा का दावा: क्या यह सच्चाई है या आंकड़ों का खेल?
विपक्ष के आरोप और असहमति
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने दावा किया कि करीब 89 लाख शिकायतें जमा की गईं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाओं और जीवित व्यक्तियों के नाम काटे गए।
RJD और AIMIM जैसे दलों ने सुप्रीम कोर्ट से समय सीमा बढ़ाने की मांग की थी, ताकि वंचित मतदाता दस्तावेज जमा कर सकें।
विपक्ष का आरोप है कि यह “वोटर लिस्ट क्लीनिंग” नहीं, बल्कि वोटर डिलीशन ड्राइव है।
कांग्रेस मुख्यालय पर भाजपा कार्यकर्ताओं पर पथराव, विधायक चौरसिया बोले – “कायराना हरकत”
असली तस्वीर
आयोग की जाँच में पाया गया कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग आपत्तियाँ दर्ज करा रहे थे जो पहले से ही अन्य बूथ या राज्य में पंजीकृत थे।
यह प्रक्रिया वास्तव में मतदाता सूची से डुप्लीकेट नाम हटाने और सूची को शुद्ध करने की दिशा में उठाया गया कदम है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर विपक्ष को भरोसा नहीं है तो वह खुद सक्रिय होकर प्रत्येक मामले में फॉर्म भरकर आपत्ति दर्ज करे, न कि केवल आरोप लगाए।
बिहार की चुनावी राजनीति में मतदाता सूची विवाद अब एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया को मान्यता दी है, लेकिन विपक्ष के आरोपों ने इस पर संदेह की परत भी चढ़ा दी है।
स्पष्ट है कि अदालत और आयोग दोनों का जोर इस बात पर है कि प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध रहे, जबकि विपक्ष को केवल आरोप लगाने के बजाय प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करनी होगी। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम संदेश है।
गांधी मैदान विवाद: राहुल गांधी के ठहरने की अनुमति को लेकर भ्रामक प्रचार या रणनीतिक राजनीति?
