Monday, February 23, 2026
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बिहार में “सूचना का अधिकार” मज़ाक बनता जा रहा है। आरटीआई कानून की खुलेआम अवहेलना, जवाबदेही शून्य

पटना।जिस सूचना के अधिकार (RTI) को आम नागरिक की ताकत और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का हथियार माना गया था, वही अधिकार आज बिहार में सरकारी लापरवाही, टालमटोल और मनमानी की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है।

हालात यह हैं कि आरटीआई आवेदन देना आसान है, लेकिन सूचना पाना महीनों तक नामुमकिन।

प्रदेश के कई जिलों से सामने आए मामलों में यह साफ दिखता है कि सूचना देने की संवैधानिक जिम्मेदारी को विभाग गंभीरता से नहीं ले रहे। कानून के तहत 30 दिनों में सूचना देना अनिवार्य है, लेकिन व्यवहार में महीनों बीत जाने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिलता।

जानकारी उपलब्ध नहीं” — सबसे सुरक्षित ढालअनेक मामलों में विभागों का जवाब एक ही लाइन में सिमट जाता है—“यह जानकारी इस कार्यालय के पास उपलब्ध नहीं है।”जबकि वही जानकारी उसी विभाग या उससे जुड़े कार्यालयों में मौजूद होती है। और जानकारी देने से संबंधित विभाग ही यह कहता है कि यह जानकारी उस विभाग के पास नहीं है तो आवेदन करता क्या करें, कहां जाए?

आरटीआई कानून स्पष्ट करता है कि यदि सूचना किसी अन्य शाखा के पास है तो आवेदन ट्रांसफर करना विभाग की जिम्मेदारी है, लेकिन यहां जिम्मेदारी आवेदक पर थोप दी जाती है।

जमीन से जुड़े दस्तावेज़—खतियान, जमाबंदी, बंदोबस्त, म्यूटेशन, रजिस्ट्री के कागजात—पर जानकारी मांगे जाने पर विभागीय अधिकारी सीधे लिख देते हैं कि“यह कागजात विभागीय काउंटर पर उपलब्ध है।”

भूमि मामलों में सूचना देना ‘काउंटर’ पर छोड़ दिया गया

यह जवाब न केवल आरटीआई कानून की भावना के खिलाफ है, बल्कि नागरिक को फिर से उसी दफ्तर के चक्कर काटने को मजबूर करता है, जहां से पारदर्शिता की उम्मीद खत्म हो चुकी होती है।

टोल आय को ‘निजी गोपनीयता’ बताकर छिपाया जा रहा

हाईवे और राज्य मार्गों पर स्थित टोल प्लाजा की आय से संबंधित जानकारी मांगे जाने पर कई विभाग इसे निजी कंपनी की गोपनीयता का मामला बताकर सूचना देने से इनकार कर देते हैं।जबकि सच्चाई यह है कि

टोल सरकारी भूमि पर वसूला जाता है।

सरकारी अनुबंध के तहत संचालित होता है।

और सीधे सार्वजनिक राजस्व से जुड़ा होता है।

फिर भी जानकारी छिपाना कानून की गलत व्याख्या और जनहित के साथ धोखा माना जा सकता है।

अवैध खनन पर सबसे ज्यादा चुप्पी

अवैध मिट्टी, बालू और खनन से जुड़े मामलों में आरटीआई व्यवस्था लगभग ठप नजर आती है।कई मामलों मेंछह महीने से अधिक समय बीत जाता है

न सूचना दी जाती हैन यह बताया जाता है कि कार्रवाई हुई या नहीं यह चुप्पी गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या सूचना दबाई जा रही है?

या कहीं अवैध गतिविधियों को संरक्षण तो नहीं दिया जा रहा?सूचना आयोग भी बोझ तले दबा

सूचना न मिलने पर आवेदक जब प्रथम और द्वितीय अपील करता है, तो वहां भी मामलों की भारी लंबित संख्या

सुनवाई में देरी और दंडात्मक कार्रवाई का अभाव आरटीआई व्यवस्था को कमजोर बना देता है।नतीजतन, अधिकारी निडर होकर कानून की अनदेखी करते हैं।

लोकतंत्र के लिए चेतावनी

सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं, लोकतंत्र की आत्मा है। जब नागरिक को यह अधिकार प्रभावी रूप से नहीं मिलता, तो भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। प्रशासन की जवाबदेही खत्म होती है और जनता का भरोसा टूटता है सुधार नहीं हुआ तो अधिकार केवल कागज़ों में रह जाएगा

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि सूचना न देने वाले अधिकारियों पर तुरंत और कठोर दंडभूमि, खनन और टोल से जुड़ी सूचनाओं का स्वतः प्रकाशन और सूचना आयोगों को अधिक संसाधन व अधिकार दिए बिना स्थिति नहीं सुधरेगी। जब तक बिहार में सूचना देना बोझ समझा जाता रहेगा,तब तक सूचना का अधिकार कानून तो रहेगा, लेकिन अधिकार नहीं।

नोट -: इन सब आरोपों के दस्तावेजी सबूत न्यूज लहर के पास उपलब्ध हैं

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