पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के दो दिन पूर्व ही संपन्न हुए चुनाव में विश्वविद्यालय के दोनों ही महत्वपूर्ण जगहों पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार शांतनु शेखर यादव अध्यक्ष पद पर और खुशी महासचिव पद पर निर्वाचित घोषित हुई है जबकि उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय सिफत फैज और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अभिषेक कुमार संयुक्त सचिव पद पर और हर्षवर्धन कोषाध्यक्ष पद पर निर्वाचित घोषित हुए हैं।
बिहार की राजनीति में पटना यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में हार जीत को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। देश भर में प्रसिद्ध जयप्रकाश आंदोलन हो या फिर बिहार के आज के राजनीति के मुख्य चेहरा लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी, सांसद रवि शंकर प्रसाद जैसे अनेकों नेता है। जिनकी राजनीतिक शुरुआत पटना यूनिवर्सिटी से ही हुई है। और यही युवा नेता आगे के वर्षों में बिहार को नए नेतृत्व देते रहे हैं।
ऐसे में पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनाव में बिहार में सत्ताधारी दल जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के समर्थित छात्र यूनियन के उम्मीदवारों की करारी हार दोनों प्रमुख दलों के लिए खतरे की घंटी है।
बिहार के सत्ताधारी दल के समर्थक राजनीतिक विश्लेषण पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ में सत्ताधारियों को मिली हार पर भले ही अलग बयान बाजी कर रहे हो। मतलब महाविद्यालय में चुनाव परिणाम में राजनीतिक दलों की कोई अहम भूमिका नहीं रहती है। उम्मीदवार की सक्रियता, चाल, चरित्र, व्यवहार ही छात्र मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करता है।
लेकिन इसमें यह तथ्य भी सर्वविदित है की महाविद्यालय के चुनाव में राजनीतिक दल के छात्र संगठन के नेता, पदाधिकारी अपने उम्मीदवारों के जीत के लिए एडी चोटी का जोर लगाए रहते हैं। और उम्मीदवार के प्रचार पोस्टर में भी साफ तौर पर उनके साथ संगठनों का नाम रहता है।
ऐसे में यह कहना की महाविद्यालय के चुनाव में छात्र मतदाता सिर्फ और सिर्फ छात्र उम्मीदवारों के व्यक्तित्व को देखकर मतदान करते हैं, यह पूरी तरह से गलत साबित होता हैं।
भाजपा समर्थित छात्र संगठन ABVP के एक छात्र जो इस चुनाव में परिषद के उम्मीदवारों को जीताने के लिए पूरी तरह से सक्रिय था। उनके अनुसार पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनाव में अध्यक्ष और महासचिव के पद पर भाजपा समर्थित विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवारों की हार का कारण एकमात्र है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता इन छात्रसंघ के चुनाव में जीत के लिए जोरदार ढंग से प्रयास करते है और जीत जाने पर पूरे देश में इस जीत का ढिंढोरा पीटते है और भाजपा नेतृत्व का वहीं से काम खत्म हो जाता है फिर वह अपने छात्र संगठन के विजय उम्मीदवारों की कोई बात नहीं सुनते हैं।
और इसका खामियांजा अगले चुनाव में परिषद के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ता है और इसीका उदाहरण 2026 का पटना यूनिवर्सिटी छात्रसंघ का चुनाव परिणाम है जिसमें परिषद के अध्यक्ष और महासचिव के उम्मीदवारों को करारी हार झेलनी पड़ी।
परिषद के उस सक्रिय कार्यकर्ता के अनुसार पिछले चुनाव में पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की मैथिली मृणालिनी ने अध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की थी। अपने चुनावी एजेंडा में मैथिली मृणालिनी ने अपनी जीत के बाद पटना यूनिवर्सिटी को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिलाने, नेशनल रैंकिंग में पटना यूनिवर्सिटी को देश के प्रमुख विश्वविद्यालय में शामिल करवाने का प्रयास करने का वादा किया था। जीत के बाद परिषद के तरफ से केंद्र में सत्तासीन भाजपा नेतृत्व से प्रयास भी किया गया था लेकिन परिणाम सकारात्मक नहीं निकला।
जबकि पटना यूनिवर्सिटी के ही एक सक्रिय छात्र नेता के अनुसार इस चुनाव में बिहार में सत्ताधारी दलों के प्रति उनके द्वारा किए जा रहे मनमानी और गलत निर्णय पर भी छात्रों में रोष दिखा। राज्य भर में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है। कहीं कोई अंकुश लगाने का प्रयास नहीं दिख रहा है।
दिनदहाड़े हत्या लूट की घटनाओं में भी कोई कमी नहीं दिख रही है। और फिर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए और पिछले दरवाजे से सत्ता में आने के लिए राज्य भर की महिलाओं को चुनाव के पहले 10 – 10 हजार रुपए बांटें जाने की घटना से छात्रों में रोष का माहौल दिखा।
और इन मामलों के साथ आग में घी डालने का काम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का यूजीसी पर हालिया बयान रहा। जिसमें उन्होंने कठोरता से यूजीसी कानून को मानने की वकालत की हैं। जिससे संघ को मानने वाला छात्र मन भी उद्वेलित दिखा।
