बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में ‘हिन्दी पखवारा-सह-पुस्तक चौदस मेला’ के पाँचवे दिन हुई ‘कथा-कार्यशाला’, शब्द-साधना पर दिया गया जोर
पटना, 5 सितंबर।
कथा-साहित्य आदिकाल से मानव-मन को आकर्षित करता रहा है। इसका सबसे गहरा प्रभाव बाल-मन पर पड़ता है। दादी-नानी की गोद में कहानी सुनते हुए ही एक बालक का शैशव बीतता है। कहानियाँ सदियों से मानव-जीवन को संस्कारित करती आई हैं, इसलिए कथाओं में कौतूहल और रोमांच के साथ-साथ जीवन के संदेश का होना भी आवश्यक है।
यह बातें शनिवार को बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित ‘कथा-कार्यशाला’ की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कहीं। सम्मेलन में विगत 1 सितंबर से चल रहे ‘हिन्दी पखवारा-सह-पुस्तक चौदस मेला’ के पाँचवे दिन यह कार्यशाला आयोजित की गई थी।
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डॉ. सुलभ ने कहा कि सभी लेखकों, पत्रकारों और वक्ताओं को ‘शब्द-साधना’ अवश्य करनी चाहिए। शब्द-साधना का अर्थ है कि प्रयोग में आने वाले प्रत्येक शब्द का अर्थ, उसके लिंग सहित जाना जाए और अपना शब्द-सामर्थ्य बढ़ाया जाए। भाषा से ही लेखक के घनीभूत भावों को सही अर्थ मिलता है।
कार्यशाला में आचार्य की भूमिका में वरिष्ठ कथाकार और सम्मेलन के साहित्य मंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कथा-सृजन के विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रशिक्षण दिया। उन्होंने शिल्प, शैली, कथानक, कथोपकथन, भाषा, कथारंभ से लेकर उसके विकास, पात्रों के चरित्र-चित्रण, उत्कर्ष और अंत तक की लेखन-विधि से नव-लेखकों को परिचित कराया।
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उन्होंने कहा कि कहानी के मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं – कहानी, उपन्यास और लघुकथा। उपन्यास एक सागर की भाँति है, कहानी नदी जैसी और लघुकथा जल की एक बूँद जैसी।
इस अवसर पर वरिष्ठ लेखिका विभा रानी श्रीवास्तव, डॉ. पूनम आनंद, डॉ. विद्या चौधरी, सागरिका राय, ई. अशोक कुमार, इन्दु भूषण सहाय, डॉ. कुंदन लोहानी, कृष्ण रंजन सिंह, डॉ. अमरनाथ पाण्डेय, डॉ. नागेश्वर प्रसाद यादव, चंदा मिश्र, प्रवीर कुमार पंकज, शंभुनाथ पाण्डेय, श्याम मनोहर, ईशा कुमारी, मुर्कम कुमार सहित बड़ी संख्या में साहित्यकारों और नव-लेखकों ने भाग लिया।
