बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गत 6 मार्च को राज्यसभा की सदस्यता लेने की तैयारी के साथ इन दिनों वे समृद्धि यात्रा पर हैं। सीमांचल की यात्रा के दौरान उनका अंदाज और संबोधन में वे यह कहीं भी नहीं दिखा रहे हैं कि वे बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में बस कुछ ही दिन के लिए है। उनके मन में क्या है? क्या वे राज्यसभा में पहली बार जाने की खुद की तैयारी भूल गये हैं।
हालांकि सीएम के साथ चल रहे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी हमेशा अपने संबोधन में यह कहने से नहीं चूक रहे कि दिल्ली जाने पर भी नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में सरकार काम करेगी । इधर सीएम नीतीश कुमार के अंदाज से जहां आम लोगों में यह चर्चा जोड़ों पर है कि कहीं नीतीश कुमार अपनी पुरानी आदत पलटी मारने की तो नहीं दोहराएंगे?
भाजपाइयों में जहां मुख्यमंत्री की सक्रियता ने उनकी बेचैनी बढ़ा दी है। वही मुख्यमंत्री के समर्थकों में एक नई आश जगी है। और उनमें उत्साह का माहौल है। क्योंकि नीतीश हर जगह अपनी सरकार के अगले पांच वर्षों के लक्ष्य का उल्लेख कर रहे हैं।
ज्ञात हो की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने के लिए नामांकन दाखिल करने के दो दिन बाद से ही अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। 2 दिन पहले जहां वे पटना क्षेत्र में चल रहे विभिन्न विकास कार्यों का निरीक्षण करते हुए दिखे, वही वे सुपौल,मधेपुरा,अररिया और किशनगंज में अरबों रुपये की योजनाओं का सौगात दे चुके हैं।
सबसे ध्यान देने वाली बात मुख्यमंत्री इन कार्यक्रमों में अपने भाषण में वे यह कहीं नहीं बता रहे हैं कि वह बिहार छोड़कर जा रहे हैं। हर जगह पर अगले 5 साल तक क्या-क्या विकास कार्य करने हैं। यही उनके भाषण का केंद्र रह रहा है। हालांकि सीएम के साथ चल रहे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी हमेशा अपने संबोधन में यह कहने से नहीं चूक रहे कि दिल्ली जाने पर भी नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में सरकार काम करेगी ।
इन बातों पर प्रतिक्रिया देते हुए बिहार की राजनीति को नजदीक से जानने वाले बिहार के वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय कहते हैं कि 5 वर्ष पहले तक नीतीश कुमार का एक अपना प्रभुत्व था। लेकिन अब उनकी क्रियाकलाप साफ़ दर्शाता है कि वे बातों को भूलने लगे हैं। जो किसी भी राज्य सत्ता और शासन के लिए बोझ जैसा है।
वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय के अनुसार नौकरशाही का बोलबाला हो गया है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व काल में पहली बार सरकार अभूतपूर्व वित्तीय संकट से जूझ रही है। विधानसभा चुनाव के पहले मुफ्त की योजनाओं सहित अन्य लोलुभावन घोषणाओं से सरकारी खजाने में बजट से 60 हजार करोड रुपये से अधिक का बोझ बढने से यह संकट आया है।
