फतुहा (पटना):
आकाश में उमड़ते सफेद बादलों की गड़गड़ाहट नहीं, बल्कि धरती पर तड़पती एक नदी की सिसकी है यह। भगवान वामन की कर्मभूमि और पितरों के तर्पण के लिए विख्यात पुनपुन और गंगा का संगम स्थल आज अपनी पवित्रता खोकर ‘सफेद जहर’ की चादर ओढ़े खड़ा है। फतुहा के इस पावन तट का नजारा आज दिल्ली की प्रदूषित यमुना की याद दिला रहा है, जहाँ लहरों की जगह जहरीली झाग तैर रही है।
नमामि गंगे: अरबों का निवेश, शून्य का विशेष
सरकारें नदियों के अस्तित्व को बचाने के लिए ‘नमामि गंगे’ जैसी परियोजनाओं के नाम पर अरबों रुपये पानी की तरह बहा रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी दावे और योजनाएं फतुहा के संगम तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती हैं। यह केवल नदी का प्रदूषण नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और भावनाओं के साथ सीधा खिलवाड़ है।
फाइलों में दब गई विधान परिषद की ‘गूंज’
इतिहास गवाह है कि 10 मई 2025 को जब बिहार के एक प्रमुख दैनिक ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, तो बिहार विधान परिषद में इसकी गूंज सुनाई दी थी। वन एवं पर्यावरण समिति ने संज्ञान लिया, जांच कमिटी बनी और बड़े-बड़े वादे हुए। इस जांच कमिटी के अध्यक्ष ज्ञानू सिंह बनाए गए थे।
इस कमेटी ने महज दो महीने में ही अनेकों बार फतुहा के साथ पुनपुन के किनारे बसे अनेकों गांव का दौरा किया था। इस दौर में राज्य सरकार के संबंधित विभाग के अनेक सचिव स्तरीय अधिकारी भी रहते थे। कमिटी ने इस बारे में विस्तार से रिपोर्ट तैयार की थी। तथा पुनपुन नदी के पूरी तरह दूषित होने संबंधित जानकारी राज्य सरकार को दी थी। रिपोर्ट में इसके कारणों और उपाय पर भी टिप्पणी की थी
लेकिन अफसोस! चुनावी बयार में वे तमाम रिपोर्ट सुझाव व उपाय हवा में उड़ गए। न कमिटी की रिपोर्ट धरातल पर उतरी और न ही रासायनिक कचरे को रोकने का कोई ठोस इंतजाम हुआ। नतीजा आज सबके सामने है—पुनपुन का काला पानी अब जहरीले श्वेत झाग में तब्दील होकर सीधे गंगा की कोख को मैला कर रहा है।
बीमार होती तराई और बेबस श्रद्धालु
आज हालात इतने बदतर हैं कि:
स्वास्थ्य का संकट: तराई में बसने वाले ग्रामीण गंदे पानी की बदबू और चर्म रोगों के शिकार हो रहे हैं।
आस्था पर प्रहार: संगम पर स्नान करना तो दूर, पूजा-पाठ के लिए आचमन का जल लेना भी नामुमकिन हो गया है।
वरीय पत्रकार अरुण कुमार पाण्डेय के अनुसार, “नमामि गंगे के तहत करोड़ों की लागत से बना सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) सफेद हाथी साबित हो रहा है। प्रशासन की उदासीनता ने इस पावन भूमि को नर्क बना दिया है।”
चेतावनी: अब जन-आंदोलन की तैयारी
नदी की इस दुर्दशा पर स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों का आक्रोश चरम पर है। यदि सरकार और प्रशासन ने जल्द ही रासायनिक गंदे पानी को रोकने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए, तो फतुहा की धरती से एक बार फिर विशाल जन-आंदोलन का शंखनाद होगा।
”नदी सिर्फ जल का स्रोत नहीं, संस्कृति की वाहक है। यदि पुनपुन का अस्तित्व मिटा, तो हमारी पहचान भी मिट जाएगी।”
