पटना को स्मार्ट बनाने का दावा अब महज एक “वित्तीय जालसाजी” जैसा प्रतीत हो रहा है। जहाँ एक ओर बुनियादी ढांचा दम तोड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कागजी योजनाओं और फिजूलखर्ची के जरिए जनता की गाढ़ी कमाई को ठिकाने लगाया जा रहा है।
1पटना मेट्रो: असीमित बजट, अनिश्चित भविष्य :पटना मेट्रो का निर्माण अब तक की सबसे बड़ी पहेली बन चुका है। चुनावी लाभ के लिए पटना बस स्टैंड से भूतनाथ तक का “सिंबॉलिक” काम तो शुरू हुआ, लेकिन उसके बाद की प्रगति शून्य है।
* सवाल: पटना मेट्रो के निर्माण में देरी के बावजूद ठेकेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
* वित्तीय अनियमितता: डेडलाइन बीतने के बाद बजट में हजारों करोड़ की बढ़ोतरी आखिर किसकी जेब भरने के लिए की जा रही है? क्या इसकी कोई समय-सीमा या जवाबदेही तय है?
2. ‘स्मार्ट बस स्टॉप’ का फ्लॉप शो: ₹23 करोड़ का गबन?: अब आते हैं पटना स्मार्ट सिटी योजना के तहत चार-पांच वर्ष पूर्व निर्मित स्मार्ट बस स्टॉप योजना पर। योजना में ₹23 करोड़ खर्च कर 18 स्मार्ट बस स्टॉप बनाए गए, जो आज भ्रष्टाचार के स्मारक बनकर खड़े हैं। मतलब आज ये स्मार्ट बस स्टॉप आम नागरिकों के लिए पूरी तरह से अनुपयोगी है।
* लागत का सच: इसके साथ जिस बस स्टॉप की वास्तविक लागत ₹20-30 लाख से अधिक नहीं होनी चाहिए थी, उसके लिए सरकारी खजाने से ₹1.30 करोड़ प्रति स्मार्ट बस स्टॉप क्यों खर्च किए गए?
यह जवाब देने के लिए किसी की भी जवाबदेही निश्चित नहीं है जो यह साफ शब्दों में साबित करता है कि यह सीधा-सीधा जनता के पैसे की लूट है।
* अनुपयोगिता और जिम्मेदारी: आज ये स्मार्ट बस स्टॉप आम नागरिकों के किसी काम के नहीं हैं। इस बर्बादी का जिम्मेदार कौन है? क्या किसी अधिकारी या नेता की संपत्ति से इसकी वसूली होगी?
इस अनूपयोगी पड़े स्मार्ट बस स्टॉप को निर्माण करने वाले संबंधित विभागीय अधिकारी पर कोई जवाबदेही क्यों नहीं निश्चित की गई है?
3. ‘ग्रीन बस स्टॉप’ के नाम पर नया छलावा: पुराने जख्म अभी भरे नहीं थे कि एक बार फिर पटना स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के नाम पर 50 नए ‘ग्रीन अत्याधुनिक बस स्टॉप’ के निर्माणों की घोषणा की गई है। यह स्पष्ट रूप से पुराने भ्रष्टाचार को ढंकने और नए शिरे से नए बजट हड़पने की साजिश है।
प्रशासन से सीधे सवाल:
- जब पुराने 18 स्मार्ट बस स्टॉप्स विफल रहे, तो नए प्रोजेक्ट की अनुमति किस आधार पर दी गई?
- इसे सुचारु रूप से चलाने के लिए पटना स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के पास क्या योजना है और इसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया है?
- इस योजना के पूरे होने के बाद यह भी पुराने स्मार्ट शब्द स्टैंड योजना के तहत फ्लॉप साबित होगा तो इस बार जवाबदेही (Accountability) के क्या प्रावधान हैं?
- क्या विफल होने पर संबंधित अधिकारियों के वेतन से कटौती या उन पर कानूनी कार्रवाई होगी?
- क्या सरकार के पास इस प्रोजेक्ट का कोई ‘सस्टेनेबिलिटी ऑडिट’ (Sustainability Audit) उपलब्ध है?
पटना की जनता को “स्मार्टनेस” नहीं, बल्कि ईमानदारी चाहिए। विकास के नाम पर केवल कंक्रीट के ढांचे खड़े करना और फिर उन्हें लावारिस छोड़ देना स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वित्तीय अपराध है।
