Wednesday, March 11, 2026
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बिहार बीजेपी में “मुख्यमंत्री की कुर्सी किसको” इस पर चर्चाओं का बाजार गर्म

राजेश सिन्हा

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण करने के लिए आवेदन देने के साथ ही बिहार बीजेपी में “मुख्यमंत्री की कुर्सी किसको” इस पर चर्चाओं का बाजार गर्म है. विधानसभा चुनाव में सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड से ज्यादा सीट लाने के बावजूद, भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने एक बार फिर नीतीश कुमार को राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी देने पर अपनी सहमति दी थी।

लेकिन कुछ कारण बस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने स्वेक्षा से 6 मार्च को राज्यसभा जाने के लिए अपना आवेदन दिया है और उनके द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ना लगभग निश्चित माना जाता है।

ऐसे में बिहार भर में यह चर्चा जोर-शोर से है कि भाजपा की तरफ से इस बार मुख्यमंत्री किसे बनाया जाएगा। बिहार की राजनीति को नजदीक से जानने वाले अनेक जानकारो का मानना है कि राज्य के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की पहली पसंद है। तीन महीने पहले ही राज्य में नई सरकार गठन के साथ उपमुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही सम्राट चौधरी ने कड़े तेवर का परिचय दिया था।

सूत्र बताते हैं कि उस दौरान जदयू के नेताओं ने इसका जमकर विरोध किया था और उसके बाद उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी अपने हर कार्रवाई पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में यह शब्द जोड़कर बोलते थे। अब स्थितियां बदली है शायद इन्हीं परिस्थितियों का हवाला देकर उस दौरान भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने ही सम्राट चौधरी को शांत रहने की सलाह दी थी।

राजनीतिक विश्लेषक यह मानते हैं की बिहार की जो स्थिति है उसके लिए सबसे समर्थवान नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पसंदीदा सम्राट चौधरी ही है। बिहार में सुधार के लिए सम्राट चौधरी जैसे ही नेतृत्व कारगर साबित होंगे।

जबकि इस विश्लेषण का विरोधाभास भी है जिसमें यह माना जा रहा है कि इन मामलों में अनेक राज्यों के उदाहरण है जिसमें भाजपा केंद्रीय नेतृत्व हमेशा ही चौंकाने वाले निर्णय लेती है। उदाहरण उत्तर प्रदेश से लिया जा सकता है जहां कर्मो-वेश बिहार जैसी ही स्थिति थी. और वहां भी अनेक मुख्यमंत्री के कुर्सी के दावेदार नेता थे. उन सबके बावजूद भाजपा की पसंद योगी आदित्यनाथ रहे। और वे सफल भी हैं।

बिहार में इस विधानसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा अपने परिवार (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के राजनीति में सक्रिय लोगों को वरीयता देना शुरू कर दिया है। जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े अनेक लोगों को पिछले विधानसभा चुनाव में टिकट देना।

और चुनाव के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के अनेक वर्ष पूर्णकालिक रहे और राज्य भर के भाजपा और परिषद कार्यकर्ताओं से प्रभावशाली जनसंपर्क रखने के कारण डॉ प्रमोद कुमार चंद्रवंशी को राज्य मंत्री मंडल में सहकारिता, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। बिहार बीजेपी का मुखिया यानि अध्यक्ष बनाने की जब बारी आए तो यहां भी विद्यार्थी परिषद के ही पूर्णकालिक रहे संजय सराबगी को ये जिम्मेदारी सौंपी गई हैं।

और सबसे ताजा मामला तो इस राज्यसभा चुनाव में देखा जा सकता है। यहां भी भाजपा की पहली पसंद जहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन हैं तो दूसरी पसंद शिवेश कुमार राम है जो बचपन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। ऐसे में राज्य में अगले मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा इस पर अंदाजा लगाना बेमानी होगी। शायद यहां भी भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने अपने हिसाब किताब का कोई नेता ढूंढ रखा होगा।

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