पटना: बिहार के राजस्व विभाग में इन दिनों ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ वाला खेल चल रहा है। एक तरफ उपमुख्यमंत्री सह राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा हैं, जो ‘फ्लाइंग स्क्वाड’ की रफ्तार से जन-संवाद कर रहे हैं, और दूसरी तरफ विभाग के वो ‘साहब’ हैं जिन्हें फाइलों की धूल झाड़ने से ज्यादा अपनी ‘इज्जत’ की फिक्र सताने लगी है।
साहबों का ‘ईगो’ हुआ हर्ट!
ताजा मामला यह है कि मंत्री जी जनता के बीच जाकर सीधे सवाल पूछ रहे हैं। अब सालों से कुंडली मारकर बैठे अंचलाधिकारी (CO) और राजस्व अधिकारियों को यह नागवार गुजर रहा है कि कोई उन्हें सरेआम यह कैसे कह सकता है कि “काम क्यों नहीं हुआ?
“बिहार राजस्व सेवा संघ (BRSA) को मंत्री जी की कार्यशैली में ‘बदतमीजी’ नजर आ रही है। संघ का कहना है कि सार्वजनिक मंच पर फटकार लगाना ‘सर्विस रूल्स’ के खिलाफ है। शायद साहबों के सर्विस रूल की किताब में यह लिखा है कि “जनता काम के लिए एड़ियां रगड़ती रहे तो ठीक, लेकिन अधिकारी को डांट पड़ जाए तो लोकतंत्र खतरे में आ जाता है।
“अजब नाराजगी: काम में सुस्ती, मान-सम्मान में चुस्ती
मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर मंत्री जी ने अपना रवैया नहीं बदला, तो वे उनके कार्यक्रमों का सामूहिक बहिष्कार करेंगे। यानी जनता की शिकायतों का अंबार लगा रहे तो कोई बात नहीं, लेकिन मंत्री जी को अपनी जुबान पर ‘प्रशासनिक शहद’ लगाकर बात करनी चाहिए।
* दफ्तर में चैन, मंच पर बेचैनी: दफ्तर के बंद कमरों में फरियादियों को टरकाने की आदत अब सार्वजनिक मंचों पर ‘एक्सपोज’ हो रही है, जिससे अधिकारियों का ‘सिस्टम’ हिल गया है।
* लोकतंत्र की नई परिभाषा: अधिकारियों के अनुसार, शायद लोकतंत्र वही है जहाँ फाइलें दबी रहें और जनता सवाल न पूछे। मंत्री का सवाल पूछना उन्हें ‘तानाशाही’ लग रहा है।
* बहिष्कार का डर: धमकी दी गई है कि बहिष्कार होगा। सवाल यह है कि अगर अधिकारी जनता के काम का पहले ही बहिष्कार न कर रहे होते, तो शायद मंत्री को सड़कों पर उतरने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
बिहार की जनता अब इस ‘नूरा-कुश्ती’ को बड़े मजे से देख रही है। एक तरफ ‘एक्शन मोड’ वाले मंत्री हैं और दूसरी तरफ अपनी ‘साख’ बचाने में जुटे अधिकारी। देखना दिलचस्प होगा कि सुशासन की गाड़ी अधिकारियों के ‘सम्मान’ से चलेगी या जनता के ‘समाधान’ से।
