पटना: न्यूज लहर ब्यूरोबिहार की सियासत में इन दिनों ‘उल्टी गंगा’ बह रही है। गंगा भी ऐसी, जिसमें भ्रष्टाचार के गोते लगाने वाले अधिकारियों का दम घुट रहा है। मामला जुड़ा है बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग से, जिसके खेवनहार बने हैं उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा।
संघ की शाखाओं से अनुशासन का पाठ पढ़कर निकले सिन्हा जी ने विभाग के उन ‘साहबों’ और ‘बाबुओं’ की घेराबंदी कर दी है, जिन्हें जनता की सेवा से ज्यादा ‘नगदी के दर्शन’ में आनंद आता था।
वेतन ‘पूर्णमासी का चांद’, ऊपरी कमाई ‘सदाबहार’
बिहार में एक पुरानी कहावत है—”सरकारी सेवा में वेतन तो बस नमक-रोटी के लिए होता है, असली घी-शक्कर तो ऊपरी कमाई है।” अंचल कार्यालयों (ब्लॉक) में बैठे सीओ साहब हों या विभाग के अमीन, इनके लिए भ्रष्टाचार कोई गुनाह नहीं, बल्कि एक ‘शिष्टाचार’ बन चुका था। पटना के आलीशान फ्लैट, लग्जरी गाड़ियाँ और संतानों की अय्याशी इसी ‘सदाबहार’ कमाई के दम पर चलती थी।
लेकिन विजय सिन्हा ने आकर सारा गणित ही बिगाड़ दिया। उन्होंने साफ कह दिया—”लटकाओ, भटकाओ और खींचो” वाला फार्मूला अब नहीं चलेगा। अब जनता मालिक है और अधिकारी सेवक। यह सुनकर उन भ्रष्ट अधिकारियों को काठ मार गया है, जो खुद को विभाग का अघोषित ‘स्वामी’ समझते थे।
राजस्व सेवा संघ का ‘संसदीय’ विलाप
जब से मंत्री जी ने जिलों में घूम-घूमकर ‘जन कल्याण संवाद शिविर’ लगाना शुरू किया है, तब से अधिकारियों का चैन छिन गया है। जनता के सामने ऑन-स्पॉट निपटारा और काम में लापरवाही पर तत्काल निलंबन की चेतावनी ने ‘साहबों’ की घिग्घी बांध दी है।
अब इस ‘पीड़ा’ को राजस्व सेवा संघ ने बड़े ही संवैधानिक शब्दों में लपेटकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक पहुँचाया है। संघ का कहना है कि मंत्री जी ‘तमाशाई शासन’ कर रहे हैं। अधिकारी तर्क दे रहे हैं कि उन पर ‘काम का बोझ’ बहुत है। मतलब साफ है—काम ज्यादा है, इसलिए रिश्वत लेना जायज है?
वाह रे बेशर्मी!
अधिकारियों का यह ‘इमोशनल अत्याचार’ दरअसल उस कमाई के बंद होने का दर्द है, जो रोज शाम को जेबें भारी करती थी।
क्या ‘जिगर के लिए पसीजेगा दिल?
बिहार का इतिहास गवाह है कि यहाँ के अधिकारी मुख्यमंत्रियों के ‘जिगर के टुकड़े’ रहे हैं। चारा घोटाले से लेकर एक्साइज किंग के दौर तक, अधिकारियों ने मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को अपनी उंगलियों पर नचाया है।
भ्रष्ट लॉबी अब इसी उम्मीद में है कि उनकी ‘आह’ सरकार तक पहुँचेगी और विजय सिन्हा का विभाग बदल दिया जाएगा।
राजनीति की गली में यह चर्चा आम है कि अधिकारियों की नाराजगी सरकारें बदल देती हैं। यहाँ तो शादी का वो गीत याद आता है— “दूल्हा धीरे-धीरे चल ससुर गलिया।” यानी सिन्हा जी को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।
विजय सिन्हा का ‘नमो’ मॉडल: गीदड़ भभकियों से नहीं डरेंगे
प्रधानमंत्री मोदी के प्रिय पात्र माने जाने वाले विजय सिन्हा ने ठोक कर कह दिया है कि वे किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं। उनका लक्ष्य स्पष्ट है—बिहार को भ्रष्टाचार के दलदल से निकालकर विकास की मुख्यधारा में लाना। जो अधिकारी जनता को तड़पाते थे, आज वे खुद तड़प रहे हैं। क्योंकि ‘पाप की कमाई’ पर ताला लग गया है।
न्यूज़ लहर का सवाल: क्या बिहार के विकास के लिए विजय सिन्हा का यह कड़ा तेवर जरूरी नहीं है? क्या उन अधिकारियों का साथ दिया जाना चाहिए जो भ्रष्टाचार को अपना अधिकार समझते हैं?लड़ाई अब आर-पार की है।
एक तरफ भ्रष्टाचारियों की मजबूत लॉबी है, तो दूसरी तरफ जनता की सेवा का संकल्प लिए एक ‘संघी’ मंत्री। देखना दिलचस्प होगा कि जीत ‘शिष्टाचार’ बन चुके भ्रष्टाचार की होती है या विजय सिन्हा के संकल्प की।
