पटना: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा अपने राष्ट्रीय पदाधिकारियों और राज्य प्रभारियों की बहुप्रतीक्षित सूची जारी करने के बाद बिहार की राजनीति में सरगर्मी तेज हो गई है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सह-प्रभारी के रूप में पार्टी को सफलता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे का नाम इस नई सूची से पूरी तरह नदारद है।
उन्हें न तो बिहार सरकार में कोई मंत्री पद मिला और न ही संगठन में कोई नई जिम्मेदारी दी गई, जिसके बाद उनके समर्थकों और राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है—”आखिर मंगल पांडे का खेल बिगाड़ने के पीछे कौन सुपारीबाज लगा है?”
‘डस्टबिन घोटाला’ और ऐन मौके पर ‘सुपारीबाजी’ का आरोप
मंगल पांडे के समर्थकों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि सांगठनिक घोषणाओं के ठीक पहले मीडिया में उछले कचरा व डस्टबिन प्रबंधन (डस्टबिन घोटाला) से जुड़े विवाद का सामने आना महज एक इत्तेफाक नहीं है।
समर्थकों का आरोप है कि किसी ‘सुपारीबाज’ (राजनीतिक विरोधी या पार्टी के भीतर का प्रतिद्वंद्वी) ने सोची-समझी रणनीति के तहत इस मुद्दे को ऐन मौके पर तूल दिलवाया, ताकि केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष उनकी छवि खराब की जा सके और उनके बढ़ते राजनीतिक करियर पर ब्रेक लगाया जा सके।
इसी कथित षड्यंत्र के चलते केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें फिलहाल ‘होल्ड’ पर रखा है या संगठन से दरकिनार कर दिया है।
प्रशांत किशोर के आरोप और भाजपा का विरोधाभास
राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा कोटे से राज्य के अन्य मंत्रियों पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के संदर्भ में भी देख रहे हैं।
प्रशांत किशोर का खुला हमला: जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) लंबे समय से सार्वजनिक मंचों से बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और राज्य के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डॉ. दिलीप जायसवाल पर हत्या और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप लगाते रहे हैं।
प्रशांत किशोर सार्वजनिक मंचों से सम्राट चौधरी पर हत्यारा होने का गंभीर आरोप लगाते आए हैं, वहीं दिलीप जायसवाल पर भी लगातार निशाना साधते रहे हैं।
संगठन का दोहरा मापदंड? समर्थकों का तर्क है कि जब प्रशांत किशोर द्वारा सार्वजनिक तौर पर घेरे जाने के बावजूद सम्राट चौधरी और दिलीप जायसवाल जैसे नेता बिहार सरकार में मुख्यमंत्री और मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कायम हैं
तथा केंद्रीय नेतृत्व को उनमें कोई खोट नजर नहीं आता, तो फिर केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर डस्टबिन विवाद के कारण मंगल पांडे को ही बलि का बकरा क्यों बनाया गया?
भ्रष्टाचार के आरोप बनाम पार्टी के भीतर की गुटबाजी
हालांकि, यह दावा भी पूरी तरह आधारहीन नहीं है कि मंगल पांडे का पिछले राज्य सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्यकाल विवादों से परे रहा था; उनके कार्यकाल के दौरान विभाग में भ्रष्टाचार, अपेक्षित सुधारों और विकास कार्यों की अनदेखी को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
लेकिन ऐन सांगठनिक विस्तार के समय डस्टबिन विवाद के ‘जिन्न’ का बाहर आना स्पष्ट रूप से बिहार भाजपा के भीतर चल रही आपसी प्रतिद्वंद्विता, गुटबाजी और वर्चस्व की जंग की ओर इशारा करता है।
राजनीतिक भविष्य पर सस्पेंस
क्या मंगल पांडे का राजनीतिक करियर वाकई अवसान (अंत) की तरफ बढ़ रहा है, या फिर यह केंद्रीय नेतृत्व की किसी भावी रणनीति का हिस्सा है?
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अक्सर अपने रणनीतिकारों और वरिष्ठ नेताओं को विशेष चुनावी अभियानों या आगामी सांगठनिक पुनर्गठन के लिए प्रतीक्षा सूची में रखता है।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी आने वाले दिनों में मंगल पांडे को किसी नई भूमिका में लाती है या यह डस्टबिन विवाद उनके राजनीतिक सफर पर स्थायी ब्रेक साबित होगा।
