पटना | अरुण कुमार पांडेय
बिहार की सियासत में जिस ‘टाइमलाइन’ का लंबे समय से इंतजार था, वह अब स्पष्ट हो गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के साथ ही राज्य में सत्ता हस्तांतरण की पटकथा अंतिम चरण में पहुँच चुकी है। 14 अप्रैल को नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी को अलविदा कहेंगे और 15 अप्रैल को बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।
1. विदाई की घड़ी: 14 अप्रैल को आखिरी कैबिनेट और इस्तीफा
नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर में 14 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक होगा। चारों सदनों (विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा) का सदस्य बनने का अपना सपना पूरा करने के बाद नीतीश कुमार उसी दिन अपनी 10वीं कैबिनेट की आखिरी बैठक की अध्यक्षता करेंगे।
अंतिम बैठक: सुबह 11 बजे मुख्य सचिवालय के कैबिनेट रूम में होगी।
इस्तीफा: बैठक के बाद नीतीश कुमार राजभवन जाकर राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंपेंगे। राज्यपाल उनसे नई सरकार के गठन तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का आग्रह करेंगे।
2. 15 अप्रैल: भाजपा के नेतृत्व वाली पहली सरकार का उदय
15 अप्रैल को बिहार में पहली बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार का शपथ ग्रहण समारोह होगा।
नेता का चयन: 15 अप्रैल की सुबह एनडीए विधानमंडल दल की बैठक होगी, जिसमें औपचारिक रूप से नए नेता का चुनाव किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहेंगे।
शपथ ग्रहण: शाम 4 बजे लोकभवन में मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह आयोजित होगा।
3. नया मंत्रिमंडल और पावर शेयरिंग फार्मूला
नई सरकार में मंत्रियों की संख्या अधिकतम 36 हो सकती है। एनडीए के पांच सहयोगी दलों के बीच संभावित फार्मूला इस प्रकार है:
भाजपा: 15-16 मंत्री (मुख्यमंत्री सहित)
जदयू: 14-15 मंत्री (दो डिप्टी सीएम जदयू से होने की संभावना)
लोजपा: 3 मंत्री
हम (HAM) एवं रालोमो: 1-1 मंत्री
4. निशांत कुमार का उदय और जदयू का भविष्य
नीतीश कुमार के सत्ता से हटने के बाद जदयू के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक विरासत को बचाने की है। चर्चा है कि नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को उनकी राजनीतिक विरासत संभालने के लिए सक्रिय किया जा रहा है।
भविष्य की भूमिका: पार्टी को टूट-फूट से बचाने और नीतीश कुमार द्वारा तैयार किए गए सामाजिक जनाधार (लव-कुश और अति पिछड़ा समीकरण) को साधे रखने की जिम्मेदारी निशांत पर हो सकती है।
चुनौती: राजनीति में बिना किसी अनुभव के सीधे बड़े दायित्व को संभालना और परफॉर्म करना निशांत के लिए एक कठिन परीक्षा होगी।
5. एक युग का अंत
नीतीश कुमार का पांचवां टर्म और मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पारी अब समापन की ओर है। उम्र और स्वास्थ्य कारणों से अब उनसे सक्रिय और सबल नेतृत्व की उम्मीदें कम होती जा रही हैं। ऐसे में लालू प्रसाद की राजनीति के काट के रूप में उन्होंने जो ‘सोशल इंजीनियरिंग’ तैयार की थी, उसे सुरक्षित रखना उनके उत्तराधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाली है।
