बिहार में पूर्ण शराबबंदी के बाद नीरा (Neera) न केवल स्वास्थ्य के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभरा है, बल्कि इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की तस्वीर भी बदल दी है। अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल बोधगया में इन दिनों नीरा से बने व्यंजन—खासकर तिलकुट और अनरसा—देसी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
1. मजबूरी से मजबूती तक का सफर
बोधगया के इलरा गांव के निवासी डब्ल्यू कुमार कभी दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवार का गुजारा करते थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा नीरा उत्पादन को बढ़ावा देने के फैसले ने डब्ल्यू की जिंदगी को नई दिशा दी। आज वे “आकाश जीविका” के माध्यम से स्टॉल संचालित कर रहे हैं और नीरा से बने उत्पादों के विशेषज्ञ बन चुके हैं।
2. क्यों खास है नीरा का तिलकुट?
सामान्य तिलकुट में चीनी या साधारण गुड़ का उपयोग होता है, लेकिन डब्ल्यू कुमार ने इसमें नीरा से तैयार गुड़ का इस्तेमाल कर इसे खास बना दिया है।
- सेहत का खजाना: यह तिलकुट बहुत ज्यादा मीठा नहीं होता, जिसके कारण डायबिटीज (मधुमेह) के मरीज भी इसका स्वाद ले पा रहे हैं।
- शुद्धता और स्वाद: नीरा की चाय, पेड़ा, लाई और अनरसा की मांग इतनी है कि ग्राहक एक बार स्वाद चखने के बाद बार-बार खिंचे चले आते हैं।
- पारंपरिक विधि: बनाने का तरीका पारंपरिक ही है, बस सामग्री (नीरा गुड़) इसे प्रीमियम श्रेणी में खड़ा करती है।
3. रोजगार का ‘बोधगया मॉडल’
डब्ल्यू कुमार की सफलता अब सिर्फ उनकी निजी सफलता नहीं रह गई है:
पारिवारिक उद्यमिता: शुरुआत अकेले की थी, लेकिन अब उनकी पत्नी और परिवार के सभी सदस्य इस व्यवसाय से जुड़कर आत्मनिर्भर बन चुके हैं।

- बिक्री के आंकड़े: सीजन के दौरान प्रतिदिन 150 किलो से अधिक तिलकुट की बिक्री होती है।
- आर्थिक मजबूती: सामान्य तिलकुट जहाँ 360-380 रुपये किलो बिकता है, वहीं नीरा का तिलकुट 400-410 रुपये किलो की दर से हाथों-हाथ बिक रहा है।
- बोधगया और गया में विशेष बिक्री काउंटर उपलब्ध कराए गए।
- पटना के सरस मेले में स्टॉल आवंटित किया गया, जहाँ रोजाना 70 से 100 किलो तिलकुट की बिक्री हुई।
- स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इलरा गांव जाकर इस नवाचार की सराहना की है।
