Sunday, February 8, 2026
Homeबिहारबिहार राजस्व विभाग: हड़ताल का 'फ्लॉप' शो और सुधार का नया अध्याय

बिहार राजस्व विभाग: हड़ताल का ‘फ्लॉप’ शो और सुधार का नया अध्याय

बिहार में भ्रष्टाचार के गढ़ माने जाने वाले राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में इन दिनों एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। उपमुख्यमंत्री और विभाग के मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सीधे तौर पर भ्रष्ट तंत्र और कार्यशैली को चुनौती दी है। यह लड़ाई अब केवल सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘सिस्टम’ बनाम ‘सुधार’ की सीधी जंग बन गई है।

1. जन सुनवाई: सीधे संवाद से घबराया तंत्र: मंत्री विजय सिन्हा ने एक नई परंपरा की शुरुआत की है—

शहर-शहर जाकर जन सुनवाई।

* मौके पर फैसला: जब मंत्री खुद जनता के बीच बैठकर सीओ (CO) और राजस्व कर्मचारियों की फाइलें पलटते हैं, तो अधिकारियों की जवाबदेही तय हो जाती है।

* अधिकारियों की परेशानी: जो काम बरसों से “टेबल के नीचे” के खेल की वजह से रुके थे, उन पर तुरंत आदेश होने लगे। यही वह बिंदु है जहाँ से अधिकारियों के बीच असंतोष और डर पैदा हुआ।

2. हड़ताल का दांव और सरकार का ‘मास्टरस्ट्रोक’: जब अधिकारियों को लगा कि अब उनकी मनमानी नहीं चलेगी, तो उन्होंने “हड़ताल” को हथियार बनाया। राज्य के 534 प्रखंडों के सीओ (CO) ने काम बंद करने की धमकी दी और मैदान में उतर गए। उनका लक्ष्य दबाव बनाकर पुरानी ढर्रे वाली व्यवस्था को बहाल रखना था।लेकिन, विजय सिन्हा के तेवरों ने इस बार स्क्रिप्ट ही बदल दी:

* ‘नो वर्क, नो पे’ का सख्त पालन: सरकार ने साफ कर दिया कि जनता की सेवा रोकने वालों को जनता के टैक्स का पैसा नहीं मिलेगा।

* सुविधाओं की वापसी: हड़ताल पर जाते ही सरकारी गाड़ी और दफ्तर की चाबियाँ वापस ले ली गईं।

* प्रभार का हस्तांतरण: कार्यों को बाधित होने से बचाने के लिए तुरंत वैकल्पिक प्रभार सौंप दिए गए।

3. बैकफुट पर अधिकारी: झुका ‘अहंकार’, जीता ‘सुधार: ‘जो अधिकारी कल तक “व्यवस्था ठप” करने का दावा कर रहे थे, उन्हें 24 घंटे के भीतर समझ आ गया कि इस बार सामने वाला झुकने को तैयार नहीं है।

परिणाम यह हुआ कि हड़ताल वापस ले ली गई और अधिकारी बिना शर्त काम पर लौटने को मजबूर हुए। यह बिहार के प्रशासनिक इतिहास में एक बड़ा संदेश है कि सरकार अधिकारियों की मनमानी से नहीं, बल्कि जनहित की मंशा से चलती है।

निष्कर्ष: क्या बिहार का राजस्व विभाग अब बदलेगा?विजय कुमार सिन्हा के इन कड़े फैसलों ने तीन बातें स्पष्ट कर दी हैं:

* भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस: राजस्व विभाग में अब “दलाली और देरी” की गुंजाइश खत्म की जा रही है।

* अधिकारी अब सेवक हैं, मालिक नहीं: हड़ताल की विफलता ने यह साबित कर दिया कि सरकारी मशीनरी को जनता को बंधक बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

* सुधार की राह पक्की: जब नेतृत्व के पास ‘जिगरा’ होता है, तो सबसे बड़े और जटिल विभागों में भी पारदर्शिता लाई जा सकती है।

बिहार के राजस्व विभाग में सुधार अब केवल एक संभावना नहीं, बल्कि एक अनिवार्य प्रक्रिया बन गई है। अधिकारियों की हार और मंत्री की दृढ़ता ने राज्य की जनता में एक नया भरोसा जगाया है।

यह भी पढ़े

अन्य खबरे