बिहार के विपक्ष के बाद अब सत्तापक्ष के अनेक दल बिहार में शराबबंदी कानून का विरोध करने लगे हैं। और अब यह आवाज सदन में भी उठने लगी है। इनका तर्क है कि राज्य में भले शराबबंदी लागू है, लेकिन यह अप्रत्यक्ष रूप से राज्य भर में पूरी तरह से बेअसर है।
राज्यभर में शराब की होम डिलीवरी हो रही हैं। जहां एक तरफ शराब माफियाओं का कारोबार करोड़ों अरबों का हो गया है वहीं इससे राज्य सरकार के राजस्व को भाड़ी नुकसान हो रहा है।
अनेक विधायकों ने सदन के अंदर और बाहर भी शराबबंदी के सरकार के निर्णय को गलत ठहराते हुए अवैध रूप से शराब की होमेडेलिवरी की बात रखी। इन विधायकों ने राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से एक बार फिर सरकार के शराब बंदी के निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
राज्य की नीतीश सरकार ने वर्ष 2016 से बिहार में पूरी तरह से शराब बंदी की घोषणा की है। इससे पहले वर्ष 2005 से राज्य में सत्तासिन नीतीश सरकार ने राज्य के नागरिकों को शुद्ध शराब उपलब्ध कराने की मंशा से ब्लॉक और पंचायत स्तर पर शराब का ठेका आवंटित किया था।
लेकिन वर्ष 2016 में अचानक ही नीतीश सरकार ने यह निर्णय लिया कि राज्य में शराबबंदी का कानून लागू किया जाए। यह निर्णय राज्य में बढ़ रहे अपराध की घटनाओं को रोकने, बलात्कार या फिर महिलाओं से दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाने और महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए किए जाने की बात बार-बार राज्य के मुख्यमंत्री उस दौरान की अपनी जनसभा में करते थे।
राज्य में शराब बंदी लागू हुए लगभग 10 वर्ष होने को है और इस दौरान शराबबंदी पूरी तरह से बंद होने के कहीं भी चिन्ह नहीं दिखे। इस दौरान बिहार पुलिस ने लगभग 500 करोड़ के शराब नष्ट किए हैं और इसके साथ 10 लाख से अधिक लोग या तो शराब पीने के कारण या फिर शराब बेचने के आरोप में जेल गए हैं। अनेक मामले जहरीली शराब पीने से मौत के भी है।
इन्हीं सच्चाइयों को रखकर वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने राज्य विधानसभा में बहुमत मिलने पर राज्य से शराब बंदी कानून खत्म करने की बात कही थी। उनके अनुसार राज्य में शराब बंदी हटाने से राज्य सरकार को होने वाली आय कापैसा राज्य के शिक्षा के विकास और आधुनिकरण में लगाया जाएगा
अब अगर समीक्षात्मक ढंग से कहा जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं है, कि बिहार में शराब बंदी का राज्य के मुख्यमंत्री का प्रयास आंशिक तौर पर भले ही असफल साबित हुआ है। लेकिन इसमें शराब पीकर सार्वजनिक ढंग से हुड़दंग करने की घटना हो, महिलाओं से अपराध के साथ घरेलू हिंसा के मामलों में कमी जरूर आई है।
वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय के अनुसार बिहार में नीतीश कुमार का मुख्य जनाधार उनका यहां की महिला वोटर है। जो बिना जात, पात, धर्म पंत देखे उनकी पार्टी जदयू और उनके गठबंधन में सभी सहयोगी दलों को एकमुश्त मतदान करती है।
और इन्हीं कारणों से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्य की महिलाओं की जीवन शैली सुधारने, उनकी शिक्षा से लेकर उनके जीवन समृद्धि तक के लिए अनेक योजना चला रहे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इसी अभियान के तहत राज्य में शराबबंदी अभियान भी लागू है। इससे राज्य भर में महिलाओं से होने वाले घरेलू हिंसा, व्यभिचार, एवं महिला अपराध में निश्चित रूप से कमी आई है।
अब विपक्ष के साथ सत्ता में सहयोगी दलों द्वारा शराबबंदी हटाने की मांग पर मुख्यमंत्री क्या रुख अपनाते है इसकी प्रतीक्षा हर बिहार वासियों को रहेगी।
