Tuesday, March 17, 2026
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पटना नीट छात्रा मामला: सीबीआई की नई ‘मैपिंग’ रणनीति या महज खानापूर्ति?

पटना में नीट छात्रा बलात्कार और मौत मामले में जांच की कमान संभालने के बाद से ही केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की कार्यशैली सवालों के घेरे में है। 10 फरवरी से केस हाथ में लेने के बावजूद, एजेंसी अब तक किसी ठोस नतीजे या नई दिशा को पकड़ने में नाकाम रही है। हाल ही में कोर्ट में पेश की गई 1000 पन्नों की रिपोर्ट पर माननीय न्यायालय की ‘असंतोषजनक’ टिप्पणी ने सीबीआई की गंभीरता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।


कल कोर्ट में इस मामले में गिरफ्तार एकमात्र आरोपी मनीष रंजन की जमानत याचिका रद्द करते हुए न्यायालय ने सीबीआई को इस मामले में विभिन्न पहलुओं की जांच के बाद रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है।

इसी के तहत ​मंगलवार को सीबीआई की टीम एक पेशेवर आर्किटेक्ट के साथ हॉस्टल पहुंची। लगभग दो घंटे तक कमरों, खिड़कियों की ऊंचाई और बालकनी के ले-आउट की नापी की गई। एजेंसी का तर्क है कि वह ‘फॉरेंसिक मैपिंग’ के जरिए यह समझना चाहती है कि क्या मौत की शुरुआती थ्योरी और कमरे की भौगोलिक स्थिति में कोई विरोधाभास है।

​हालांकि, जानकारों का मानना है कि जब मुख्य आरोपी मनीष रंजन की जमानत याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी है, तब जांच का केंद्र ‘दीवारों की नाप’ के बजाय ‘आरोपियों से पूछताछ’ होना चाहिए था।

जांच की दिशा पर उठते गंभीर सवाल
​इस मामले में सीबीआई की कार्रवाई को लेकर कई विसंगतियां उभरकर सामने आ रही हैं। यह चौंकाने वाला तथ्य है कि जांच एजेंसियां आरोपी मनीष रंजन की जमानत का विरोध करने के बजाय उसके पक्ष में ढुलमुल नजर आईं। हालांकि, सोमवार को न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए जमानत याचिका रद्द कर दी।

​इस मामले मृतका के परिजनों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर शुरू से ही दुष्कर्म (रेप) का आरोप लगाया है। ऐसे में अस्पताल प्रबंधन और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों से कड़ाई से पूछताछ करना अनिवार्य था, लेकिन सीबीआई इस मोर्चे पर सुस्त नजर आ रही है।

​कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि सीबीआई को मुख्य आरोपी मनीष रंजन को रिमांड पर लेकर सघन पूछताछ करनी चाहिए थी, ताकि ‘तीसरे कोण’ का सच सामने आ सके। लेकिन आज के क्रिया कलाप फिर CBI की भूमिका को संदिग्ध बताने के लिए काफी हैं।

​पटना पुलिस की शुरुआती विफलता के बाद यह केस सीबीआई को इस उम्मीद के साथ सौंपा गया था कि सच सामने आएगा। लेकिन वर्तमान में एजेंसी का ध्यान ‘आर्किटेक्चरल एनालिसिस’ जैसे तकनीकी पहलुओं पर अधिक और आपराधिक साजिश के मुख्य किरदारों तक पहुंचने के प्रयास पर कम दिख रहा है।

वार्डन से फिर से पूछताछ और एंट्री रजिस्टर की जांच एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन जब तक मेडिकल रिपोर्ट और मुख्य आरोपियों के बयानों में तालमेल नहीं बैठता, तब तक न्याय की उम्मीद धुंधली ही रहेगी।

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