बिहार विधानसभा में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए शिक्षा विभाग का 60,204.60 करोड़ रुपये का बजट सदन पटल पर रखा गया और चर्चा के बाद ध्वनिमत से स्वीकृत कर दिया गया।
हालांकि बजट पर हुई करीब दो घंटे की चर्चा के दौरान विपक्ष ने शिक्षा व्यवस्था की बदहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आधारभूत ढांचे को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोला। मंत्री के जवाब से असंतुष्ट विपक्षी सदस्य सदन से बहिर्गमन करते हुए बहिष्कार पर उतर आए।
शिक्षा पर राष्ट्रीय औसत से अधिक खर्च का दावा: शिक्षा मंत्री सुनील कुमार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बिहार में शिक्षा पर राष्ट्रीय औसत (14%) से अधिक व्यय किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि:
छात्र-शिक्षक अनुपात अब 29:1 हो गया है
ड्रॉपआउट दर 1% से भी कम है
5,87,000 शिक्षकों को हर महीने की 5 तारीख तक नियमित वेतन दिया जा रहा है
मंत्री ने कहा कि पहले शिक्षा का हाल क्या था, यह सब जानते हैं। स्कूलों की कमी, आधारभूत संरचना का अभाव और शिक्षकों की भारी कमी थी। आज स्थिति में व्यापक सुधार हुआ है।
”2005 से अब तक बजट में कई गुना वृद्धि: सरकार की ओर से दावा किया गया कि वर्ष 2005 में शिक्षा विभाग का बजट मात्र 4,400 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में बढ़कर 60,964 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। 2026-27 में प्रस्तावित 60,204.60 करोड़ रुपये का बजट शिक्षा क्षेत्र में सरकार की प्राथमिकता को दर्शाता है।
मंत्री ने “उन्नत शिक्षा, उज्ज्वल भविष्य” के तहत ‘सात निश्चय-3’ कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार दीर्घकालिक सुधार की दिशा में काम कर रही है।
साइकिल योजना का अंतरराष्ट्रीय उदाहरण: शिक्षा मंत्री ने कहा कि बिहार की साइकिल योजना की सराहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। उनके अनुसार, अफ्रीकी देशों जांबिया और मालदीव (माले) में भी इस मॉडल को अपनाया गया है, जहां यह योजना सफल साबित हुई है।
विवादित मुद्दों पर सफाई: मंत्री ने मैट्रिक परीक्षा के दौरान एक छात्रा को परीक्षा केंद्र में प्रवेश न दिए जाने के मामले पर कहा कि वे स्वयं इस प्रकरण की जांच करेंगे। इसके अलावा उन्होंने मंत्री अशोक चौधरी की डिग्री से जुड़े मुद्दे पर भी सदन में सफाई दी।
विपक्ष पर तंज: विपक्ष के बहिष्कार पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री ने कहा, “हमें उम्मीद थी कि विपक्ष की ओर से कुछ सकारात्मक सुझाव आएंगे, लेकिन वे आदत से लाचार हैं।
विपक्ष का आरोप है कि भारी बजट के बावजूद सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब भी चुनौती बनी हुई है, जबकि सरकार का दावा है कि बुनियादी ढांचे, शिक्षकों की नियुक्ति और छात्र सुविधाओं में ऐतिहासिक सुधार हुआ है।
60,204.60 करोड़ रुपये का यह शिक्षा बजट राजनीतिक रूप से जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही सामाजिक दृष्टि से भी। एक ओर सरकार इसे शिक्षा क्रांति की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष गुणवत्ता और जमीनी हकीकत पर सवाल उठा रहा है।
आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि बजट का प्रभाव कागज़ी दावों से आगे बढ़कर विद्यार्थियों के भविष्य को कितना संवार पाता है।
